Friday, September 18, 2015

OROP: सरकारी कर्मियों से 20 साल कम जीते हैं सैनिक, जानें कौन सी जॉब में ज्‍यादा life

life+armed+forces+govt+employee


अन्‍य दूसरी नौकरियों की बजाए सेना की जॉब करने वाले कम जिंदगी जीते हैं। जी हां, जब तक अन्‍य सरकारी कर्मचारी 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं पूर्व सैनिक औसतन 64 साल की उम्र में जिंदगी को अलविदा कह देते हैं। यह हम नहीं पांचवें वेतन आयोग के एक सर्वे में खुलासा हुआ था। यही वजह है कि अपने हक के लिए पूर्व सैनिक वन रैंक वन पेंशन लागू करवाने के लिए पिछले 40 साल से भी ज्‍यादा समय से संघर्ष कर रहे हैं। आइए एक खुलासे में जानते हैं कौन सी जॉब करने वाले जीते हैं भरपूर लाइफ...
जल्‍दी रिटायरमेंट, जल्‍दी मौत
सेना में जॉब करने वाले सैनिक जल्‍दी रिटायर कर दिए जाते हैं और वे जल्‍दी मर भी जाते हैं। पांचवे वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों पर एक सर्वे किया था जिसमें यह बात सामने आई। पांचवें वेतन आयोग के लिए यह सर्वेक्षण एक सरकारी एजेंसी ने किया था. सर्वे कहता है कि :

जॉबऔसत उम्र
1- सिविलियन सर्विसेज77 वर्ष
2- रेलवे कर्मचारी78 वर्ष
3- सैन्‍य कर्मचारी
i- OR (हवलदार तक)59.6 से 64 साल
ii- JCOs67 साल
iii- Officers72.5 साल


सैनिकों की जिंदगी सरकारी कर्मचारियों से 20 साल कम
सर्वे में कहा गया है कि सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके कर्मचारियों के मुकाबले सेना में नौकरी कर चुके जवान औसतन 20 साल पहले ही मर जाते हैं। जेसीओ की उम्र जवानों के मुकाबले औसतन 5 साल ज्‍यादा होती है लेकिन वे सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके कर्मचारियों के मुकाबले औसतन 15 साल कम ही जीते हैं। सैन्‍य अधिकारी इस मामले में थोड़ा लकी हैं लेकिन वे भी सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके अपने समकक्ष कर्मचारियों के मुकाबले औसतन 7 साल कम जिंदगी ही जी पाते हैं।

कठिन लाइफ में पनपती चिंता बन जाती है चिता
पूर्व सैनिकों का मानना है कि सैन्‍य जीवन बहुत कठिन होता है। कठिन तैनाती और हर समय आंखों के सामने नाचती मौत से सैनिक हमेशा स्‍ट्रेस में रहते हैं। उन पर अपना मोराल ऊंचा रखने का दबाव रहता है। जॉब के दौरान वे तलवार की धार पर चलते हैं इधर गल्‍ती उधर मौत और देश की सुरक्षा खतरे में। इतने तनाव के बाद जब परिवार-बच्‍चों की जिम्‍मेदारी सर पर आती है दूसरे शब्‍दों में कहें तो जब उनकी जिम्‍मेदारी चरम पर होती है तो वे रिटायर कर दिए जाते हैं। उस तुर्रा ये कि पेंशन भी कम. जबकि उनकी इस उम्र में सरकारी कर्मचारी नौकरी पर होते हैं और पूरा वेतन पा रहे होते हैं। बच्‍चों की पढ़ाई, नौकरी, शादी वगैरह की चिंता में वे समय से पहले बूढ़े हो जाते हैं और मर जाते हैं।


7वें वेतन आयोग से गुहार, 1973 से पहले वाली स्थिति लागू हो
कुछ माह पहले मेजर जनरल सतबीर सिंह की अगुआई में पूर्व सैनिकों के एक प्रतिनिधि मंडल ने 7वें वेतन आयोग से मिलकर उन्‍हें अपनी सेवा शर्तों और जिम्‍मेदारियों सहित सभी कठिनाइयों से अवगत कराया है। उन्‍होंने 7वें वेतन आयोग से अनुरोध किया है कि पूर्व सैनिकों की पेंशन के लिए वही फार्मूला लागू किया जाए जो 1973 से पहले लागू था। उनका यह भी कहना था कि आयोग को सैनिकों के काम करने वाले चुनौतीपूर्ण माहौल और उनकी जिम्‍मेदारियों को ध्‍यान में रखकर फैसला लेना चाहिए जो पूर्व सैनिकों के हित में हो।

इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने डाला पूर्व सैनिकों को संकट में
आपको बताते चलें कि सैनिकों की कठिन सेवा शर्तों और जोखिम भरी लाइफ स्‍टाइल को देखते हुए 1973 से पहले उन्‍हें वन रैंक वन पेंशन तो दिया ही जाता था साथ ही सामान्‍य सरकारी सेवाओं के मुकाबले 15 प्रतिशत तक ज्‍यादा पेंशन भी दी जाती थी। 1973 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस सरकार ने यह व्‍यवस्‍था खत्‍म कर दी थी। उसके बाद पूर्व सैनिकों को भी अन्‍य सरकारी कर्मचारियों जितनी पेंशन मिलने लगी और उनके दुर्दिन शुरू हो गए। तभी से पूर्व सैनिक वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

कहां कितनी मिलती है पूर्व सैनिकों को पेंशन
देशज्‍यादा (अन्‍य सरकार नौकरियों के मुकाबले)
अमेरिका20 प्रतिशत तक
ब्रिटेन10 प्रतिशत
फ्रांस15 प्रतिशत
पाकिस्‍तान15 प्रतिशत तक
जापान29 प्रतिशत तक
भारत0 प्रतशित यानी बराबर
Source: IESM (पूर्व सैनिकों का संगठन)

एक रैंक एक पेंशन का रक्षा क्षेत्र पर असर

क रैंक, एक पेंशन लागू होने के बाद रक्षा खर्च में बढ़ोतरी होने का अर्थ यह है कि सेना के आधुनिकीकरण के काम में पूंजी की और अधिक आवश्यकता होगी। विस्तार से बता रहे हैं नितिन पई
अब जबकि मोदी सरकार ने एक रैंक एक पेंशन (ओआरओपी) को लागू करने का फैसला कर लिया है तो यह आवश्यक हो चला है कि हम रक्षा नीति और तैयारी के लिहाज से इसके निहितार्थ का आकलन करते चलें। इसकी वजह से न केवल केंद्र सरकार के व्यय में दो फीसदी की अनुमानित बढ़ोतरी होगी बल्कि यह सर्वोच्च रक्षा नेतृत्व से लेकर संभावित सैनिक, और विदेशी हथियार आपूर्तिकर्ता से लेकर घरेलू रक्षा नवाचार करने वाले तक सबके लिए प्रोत्साहन में तब्दीली आ जाएगी। हम इस स्तंभ में आने वाले काफी समय तक इन विषयों का विश्लेषण करते रहेंगे। 

इस आलेख में हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि ओआरओपी का देश के सैन्य बलों के भविष्य की रूपरेखा पर क्या संभावित असर हो सकता है। इसकी बदौलत रक्षा खर्च में 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा लागू होने के बाद वेतनमान में होने वाला सुधार इसमें और अधिक इजाफा कर देगा। इससे रक्षा नीति के समक्ष तीन मोर्चों पर असुविधा पैदा होगी: वेतन भत्ते, रक्षा क्षेत्र की तैयारी का स्तर और राजकोषीय संतुलन। हम एक साथ इन तीनों में अत्यधिक इजाफा नहीं कर सकते। ओआरओपी के कारण आर्थिक बोझ बहुत तेजी से बढ़ेगा और अगर इसके चलते रक्षा तैयारी में समझौता नहीं किया गया तो राजकोषीय संतुलन के मोर्चे पर हमें परेशानी उठानी पड़ेगी। इसके लिए हमें कर्ज लेना होगा।

हम इस तीन स्तरीय दुविधा से पलायन नहीं कर सकते। हां, हम इसके प्रभाव को कम जरूर कर सकते हैं: इसका सबसे बढिय़ा तरीका है तेज आर्थिक वृद्धि। अगर हम सतत रूप से तेज आर्थिक विकास कर सकें तो हमें ओआरओपी के कारण बढ़े हुए राजकोषीय बोझ का प्रभाव कम करने में मदद मिलेगी। सेवानिवृत्त सैनिकों और उनके समर्थकों की ओर से अगर सुधार और आर्थिक उदारीकरण की मांग आती है तो भविष्य के वित्त मंत्रियों की ओआरओपी को सीमित करने की चिंता कम हो जाएगी।

ओआरओपी के आगमन से पहले भी दो दशकों तक तेज आर्थिक विकास के चलते अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में श्रम अपेक्षाकृत महंगा हो चुका है। जैसा कि अजय शुक्ला ने कुछ दिन पहले लिखा था कि ओआरओपी के बाद रक्षा खर्च का 53 फीसदी हिस्सा कार्मिकों पर खर्च होगा। सन 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने के तत्काल बाद आइजनहावर को बढ़ते रक्षा खर्च की मुश्किल का सामना करना पड़ा था। यह शीतयुद्ध के चलते पैदा हुआ था और इसके नियंत्रण से बाहर होने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा था। उस वक्त उन्होंने जो कदम उठाया वह भविष्य के नेताओं के लिए नजीर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वैसा कुछ करने पर विचार कर सकते हैं।

आइजनहावर की नीति में अतिरिक्त श्रम शक्ति के खर्च में सामरिक हथियारों में निवेश पर अनिवार्य जोर दिया गया। यूरोप और एशिया में भारी भरकम सेना बिठाने के बजाय अमेरिका परमाणु हथियारों, खुफिया ऑपरेशनों और अपने सहयोगियों पर भरोसा करने लगा। व्यापक विरोध के भय ने तत्कालीन सोवियत संघ को आगे बढऩे से रोके रखा। दूसरे शब्दों में कहें तो आइजनहावर प्रशासन ने श्रम का विकल्प पूंजी से तैयार किया। अर्थात उसने सैनिकों के बजाय परमाणु हथियारों और आपूर्ति व्यवस्था पर जोर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें लगा कि श्रम शक्ति की लागत देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुुंचा रही है। आजइनहावर को भरोसा था कि अमेरिकी आर्थिक विकास की मजबूती सोवियत संघ के साथ संघर्ष में काफी अहम थी। क्या भारत भी वही रास्ता अपना सकता है? क्या हम भी अधिकांश सैनिकों की जगह परमाणु हथियारों, मिसाइलों, विमानों, पनडुब्बियों आदि पर भरोसा कर सकते हैं? 

आइजनहावर की तरह हमें भी समझना होगा विरोधी कभी इस बात पर यकीन नहीं करेंगे कि हम केवल उनके सीमा पार करने अथवा आतंकी घुसपैठ करने की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे में एक पूरे देश को नष्ट कर सकने वाले हथियार होने के बावजूद हमें सीमाओं की रक्षा करने के लिए जवानों की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह हमें समुद्री सीमा पर भी नौसैनिकों की जरूरत होगी।

दुश्मन के सामने रहने वाली इन सैन्य टुकडिय़ों को कम बोझ वाला, सहज और नेटवर्क से लैस बनाना होगा। उनको हथियारों, मिसाइल और हवाई सहयोग के साथ-साथ लॉजिस्टिक और बुनियादी मदद भी मुहैया करानी होगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सैन्य संतुलन हमारे पक्ष में है। सवाल यह भी उठता है कि अगर 20वीं सदी में हुए युद्घों की तरह बड़े पैमाने पर होने वाले युद्घों के दिन बीत चुके हैं तो फिर सामरिक हथियारबंदी और मोर्चे पर रहने वाली सेना की जरूरत किस आधार पर तय होगी? 

अगर प्रधानमंत्री को हमारी रक्षा नीति पर नए सिरे से नजर डालनी हो तो इसमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि यदि देश की अर्थव्यवस्था में विकास के बीच सैनिकों के रखरखाव की बढ़ती लागत के कारण उनकी संख्या कम करनी हो तो सेना के आधुनिकीकरण की राह पूंजी आधारित होनी चाहिए। कार्मिक नीति कुछ ऐसी होनी चाहिए कि सैनिकों की उत्पादकता बढ़ाने में लगातार निवेश हो। इसके लिए उनको बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए, बेहतर उपकरण मुहैया कराए जाएं तथा उनकी स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। ये तमाम फैसले अभी करने होंगे क्योंकि उनके प्रभाव को सामने आने में भी वक्त लगेगा। 

आइजनहावर को अवसर की लागत की समझ थी। उन्होंने संघीय व्यय का आधा हिस्सा रक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित किया लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि हर बनने वाली बंदूक, हर युद्घपोत, हर दागा गया रॉकेट दरअसल उन लोगों के हिस्से के धन का है जो भूखे हैं और जिनको भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा, जो ठंड में ठिठुर रहे हैं और जिनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं। यह खर्च उचित था क्योंकि सशस्त्र बलों ने न केवल एक इलाके और उसके लोगों की रक्षा की बल्कि उन्होंने एक जीवनशैली को भी बचाया। बतौर राष्टï्रपति उनका काम था सेना प्रमुखों को यह अहसास कराना कि उनका कद और समझदारी ऐसी है और उनको ऐसा प्रशिक्षण मिला है कि वे युद्घ की महंगी कार्रवाई में न्यूनतम की जरूरत और देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति के बीच संतुलन कायम कर सकें। आज के भारत के संदर्भ में भी आइजनहावर की बातें उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि वे छह दशक पहले अमेरिका के बारे में थीं।
SOURCE - business-standard

Black money law helps OROP soldier on

Black money law helps OROP soldier on
Those who have retired after a lifetime of defending the nation will get their dues without hurting the exchequer perhaps because those who hid their unaccounted wealth from the taxman have paid theirs.
Business Standard has learnt from senior government sources that the three month-compliance window under the black money law could garner around Rs 20,000 crore, an amount without which implementation of one rank, one pension (OROP) would have led to stretching of the Centre's fiscal resources. With such proceeds expected through an imposition of 30 per cent tax, and a similar penalty on the value of unaccounted wealth or assets declared by anyone between July and September, the government may be able to stick to the fiscal deficit target of 3.9 per cent of the gross domestic product (GDP), without cutting capital expenditure required to kickstart investments.

EMPLOYEE NEWS CENTER: Government to announce family pension to employees...

EMPLOYEE NEWS CENTER: Government to announce family pension to employees...: Family Pension for NPS Employees – A report states that between April 1994 and April 2004, more than 50 lakh youths joined Government Serv...

Wednesday, September 16, 2015

7th Central Pay Commission – Regularisation of Retirement Age?

As the recommendation and implementation of the 7th Central Pay Commission is eagerly awaited by the central government employees, some points in the recommendations are slightly leaking in..It may not be authentically correct.
According to information from various sources, the Pay Commission may fix the minimum basic pay at Rs. 15000/- and it is assumed that a huge increase in the salaries of the employees cannot be expected. The term of the commission was extended for four months and they are in full swing giving final touches to the report to be submitted to the central government by the end of December 2015.
One more recommendation which is said to be an important one, is the regularisation of retirement age for the Central Government Employees. The Commission may recommend that an employee should retire after completing 33 years of service or at the age of 60 whichever comes first. For instance, if an employee joins a central government establishment at the age of 23, his retirement age will be 56. If this recommendation is true, it will definitely create panic among  the employees and it will not be a wise decision by the pay commission. All Federations and Associations will strongly oppose these type of recommendations…
The 6th CPC had brought various changes in the Pay Structures and introduced Grade Pay. There was a moderate increase in the Basic Pay, House Rent Allowance and re-imbursement of tuition fees was also introduced. The minimum basic pay was Rs.5200+Grade Pay 1800=Rs. 7000/- while it was Rs. 2650/- in the 5th CPC.
Further, it is also said that, the 7th CPC may abolish the 6th CPC’s Pay Scales and may bring back the old pay scales. The overall increase in the Pay Scale will be around 15% to 20%
Let us wait and see for the ultimate results…!
SOURCE - govtstaffnewsport al.in

Tuesday, September 15, 2015

Payment of Night Duty Allowance (NDA) at revised rates to the eligible civilian employees working in the Establishments under the Ministry of Defence.

Office of the Principal controller of Accounts (FYs)
10-A, S.K.Bose Road, Kolkata – 700 000
Pay/Tech-II/1206/2015/13
Dated: 09.09.2015
To,
All Cs F A (Fys)

Subject: Payment of Night Duty Allowance (NDA) at revised rates to the eligible civilian employees working in the Establishments under the Ministry of Defence.

Kindly refer to this office earlier circular No.Pay/Tech-II/1206/07 dated 28/05/2015 and No.Pay/Tech-II/1206/2015/08 dated 29/05/2015 under which the orders for payment of NDA at revised rate have been issued. In this regard it is to mention that the ceiling of pay for entitlement of NDA was Rs. 2200/- pm’ vide DOPT order dated 04/10/1989. Keeping in view of pay structure under 6th CPC it has been decided that the ceiling limit for entitlement of NDA may be fixed at Rs.12380/-. While making payment of NDA, an employee’s pay in the pay band will be compared with that figure and if pay in the Pay Band is less than above limit then he will be eligible for NDA at current rates otherwise he is not.

If any of the employees have been paid NDA already in terms of this office earlier circulars dated 28/05/2015 and 29/05/2015 whose pay in the pay band is beyond this ceiling limit, recovery action may please be initiated.

The same may please be communicated to all the Br. AOs under your jurisdiction, for necessary action at their end.

This issues with the approval of Competent Authority.

sd/-
Joint controller of Accounts (Fys)


Department of Expenditure has issued gazette notification regarding extension of 4 month to 7th Central Pay Commission...

(Department of Expenditure)
RESOLUTION

New Delhi, the 8th September, 2015

No. 1/1/2013-E. III(A).—The Government of India have decided that the Para 5 of this Ministry’s Resolution No. 1/1/2013-E.III(A) dated 28.2.2014 shall be modified as under :—

“The Commission will make its recommendations by 31st December, 2015. It may consider, if necessary, sending reports on any of the matters as and when the recommendations are finalized.”

RATAN P. WATAL, Finance Secy.


Authority: http://egazette.nic.in/

सुप्रीम कोर्ट पदोन्नति में आरक्षण पर कड़े स्टेप लिए

ten tho
SOURCE - ten tho
SOURCE - Jagran

Monday, September 14, 2015

जानिए, कैसे 7वां वेतन आयोग राज्‍य के खजाने पर डालेगा असर

नई दिल्‍ली। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में आने की उम्‍मीद है। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक इसका असर राज्‍यों के खजाने पर ज्‍यादा पड़ने की आशंका जताई जा रही है। दरअसल वेतन आयोग का गठन हर 10 साल पर बढ़ती हुई महंगाई और कर्मचारियों के हित को ध्‍यान में रखकर किया जाता है। वेतन आयोग का गठन केंद्र सरकार करती है जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतनमान, सेवा निवृत्ति के लाभ और अन्‍य सेवा शर्तों संबंधी मुद्दों पर विचार करती है। इससे पहले पाचवां वेतन आयोग एक जनवरी 1996 को और 6ठा वेतन आयोग एक जनवरी 2006 को लागू किया गया। वहीं, 7वां वेतन आयोग की सिफारिश को एक जनवरी 2016 से लागू किया जाना है।
जस्‍टिस माथुर की अध्‍यक्षता में आयोग गठित
सातवें वेतन आयोग का गठन 2014 में तत्‍कालीन मनमोहन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्‍त जज न्‍याय‍मूर्ति अशोक कुमार माथुर की अध्‍यक्षता में की। वेतन आयोग को कैबिनेट ने 28 फरवरी 2014 को मंजूरी दी। आयोग में जस्टिस माथुर के अलावा तीन और सदस्‍यों की नियुक्‍त की गई हैं। जबकि आयोग अपनी रिपोर्ट गठन की तारीख से 18 महीनों के अंदर सौंपेगी। आयोग केंद्र सरकार के कर्मचारी, अखिल भारतीय सेवाओं के कर्मी, केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारी और भारतीय लेखा परीक्षण विभाग के अधिकारी तथा रेलवे के अधिकारी व कर्मचारी के वेतन भत्‍ता सुविधाओं एवं अन्‍य लाभों की समीक्षा करेगा। जिसके आधार पर अपनी रिपोर्ट सरकार को देगा। केंद्र और राज्‍य सरकारें वेतन आयोग के इसी रिपोर्ट के आधार पर अपने कर्मचारियों का वेतन भत्‍ता और पेंशन को लागू करती है।
50 लाख कर्मचारियों व 30 लाख पेंशनरों को लाभ
सरकार के द्वारा गठित 7वें वेतन आयोग का लाभ 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 30 लाख पेंशनरों को मिलेगा। जबकि 1 करोंड़ से ज्‍यादा राज्‍य एवं स्‍थानीय सरकारी कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा क्‍योंकि राज्‍य सरकारें भी इसी के आधार पर अपने कर्मचारियों और पेंशनरों को वेतन और भत्‍ता लाभ देती है। हालांकि छठे वेतन आयोग का क्रियान्‍वयन अक्‍टूबर 2008 में हुआ जिसकी वजह से 30 महीनें का एरियर कर्मचारियों को मिला। जिसने आर्थिक मंदी के दौर से बाहर निकलने में अहम भूमिका निभाई थी। इसी कारण विकास की गति तेज हुई और अर्थव्‍यवस्‍था पटरी पर लौटने लगी।
7वें वेतन आयोग का राज्‍यों पर पड़ेगा असर
सातवां वेतन आयोग अपनी सिफारिश रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में देने वाला है। जिसका असर राज्‍यों पर भी पड़ने वाला है। यह जानकारी हाल ही में जारी एक रिपोर्ट से निकलकर सामने आई है। क्‍योंकि राज्‍यों की राजकोषीय स्थिति को यदि देखा जाए तो इसका असर उनके खजाने पर पड़ेगा जो कि उनकी वित्‍तीय स्थिति को प्रभावित करेगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्‍यों के सकल घरेलू उत्‍पाद में पेंशन खर्च की हिस्‍सेदारी कितनी है जबकि इस पर होने वाले कुल खर्च में कितना राजस्‍व खर्च होगा। रिपोर्ट के अनुसार पेंशन खर्च का मूल्‍यांकन राज्‍यों ने स्‍वयं किया है जिसकी चर्चा 14वें वित्‍त आयोग से की है। जिसे नीचे आंकड़ों में चार्ट के जरिए फीसदी में दिखाया गया है। जो कि इस प्रकार है:-



क्रम संख्‍याराज्‍यसकल घरेल उत्‍पाद में पेंशन व्‍यय की हि‍स्‍सेदारी (फीसदी में)होने वाले कुल खर्च में राजस्‍व की हिस्‍सेदारी (फीसदी में)
1आंध्र प्रदेश1.8586.2
2बिहार2.8275.58
3गुजरात0.9374.15
4हरियाणा0.9689.48
5कर्नाटक1.4184.42
6केरल2.5589.44
7मध्‍य प्रदेश1.2982.95
8महाराष्‍ट्र0.8683.11
9पंजाब1.8666.34
10राजस्‍थान1.4080.46
11तमिलनाडु1.7585.83
12उत्‍तर प्रदेश2.5671.28
13पश्चिम बंगाल1.7687.35


केंद्र और राज्‍यों पर पड़ने वाला वित्‍तीय प्रभाव

जहां सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट कुछ ही महीनों में आने वाला है इसे 1 जनवरी 2016 से लागू भी किया जाना है। वहीं 6ठे वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने पर जो कुल वित्‍तीय प्रभाव पड़ा उसका भी आंकलन रिपोर्ट में किया गया है। उसके मुताबिक केंद्रीय बजट पर 15700 करोड़ रुपए और रेल बजट पर 6400 करोड़ रुपए का बोझ पड़ा।
जबकि राज्‍यों के द्वारा वेतन आयोग की सिफारिश को लागू करने पर एरियर देने पर 2008-09 और 2011-12 में कम्‍बाइंड रेवन्‍यू अकाउंट का घाटा 2009-10 में जीडीपी के 0.6 फीसदी रही। लेकिन 7वें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद बिहार, उत्‍तर प्रदेश और केरल जैसे राज्‍यों का क्‍या स्थिति होगी जहां पर पेंशन के मद में ज्‍यादा खर्च होता है।
source - bhasker

What should be minimum wages and Fitment Formula in 7th Pay Commission report.

Minimum Wage and 7th Pay Commission wage hike Confederation of Central Government Employees and Workers Karnataka Branch estimates minimum wages and net increase out of 7th Pay Commission on the basis of some calculations.

Minimum Wages Fitment Formula and Wage Hike.

Comrades,
There are number of unwanted articles on minimum wage, fitment formula and wage hike on many websites which are not true and create confusion among the Central Government Employees. This type of the articles also give wrong impressions and give wrong signals to the Government, these articles are written without having basic knowledge of the price rise and minimum wagecalculation.
The minimum wage calculation is given below.  Hence it is requested to go through the belowcalculation of minimum wages, as the 7th CPC has indicated the use of using Dr. Aykroyd formula and 15th ILO norms for calculation of minimum wages. The rates are taken from Government shops (retail prices are 10% more than Government prices) . The rates to be taken up by the 7th CPC may vary only marginally.
We should actually wait for the 7th CPC to give its report and then we should react and staff side JCM shall take necessary steps in this regard. Let us stop all such unwanted gossips of minimumwage, fitment formula and wage hike. The model minimum wage calculated using Dr. Aykroyd formula and 15th ILO norms as on 1st July 2015 is given below.
ItemPer MonthAverage Amount
3 unitsRate
in Kgs/ mt
Rice  (fine) & Wheat atta42.75401710
Dal7.21401008
Raw Vegetables941369
Green Vegetables11.2545507
Other Vegetables6.7555372
Fruits10.875810
Milk Dairy1833594
Sugar539.5198
Edible Oil3.6114410
Fish2.54101025
Meat Mutton54502250
Egg905450
Detergents*1161.58162
Clothes5.52501375
Total11241
Miscellaneous @ 20%2248.2
Total13489
Additional @ 25%3372.3
Total16861.5
Add 10% housing1686
Minimum pay for unskilled worker in the erstwhile Group “D”18547.5
Add 25% for Group “C” ( as proposed by 6th CPC )4636.875
Total23184.375
Add 6% more prices from 1st July  2015 to 1st Jan 20161391.04
Total amountRs 24575/-
Minimum pay for skilled worker in Group “C”Say  Rs 25,000/-
Fitment formula = Rs 25000/7000 = 3.5
The main goal is to educate the Central Government Employees and prepare for the struggle path in case the  important demands expected of the 7th CPC are not met.
A) Minimum wage of Rs 25,000/- as per Government prices.
B) Fitment formula of 3.5
C) Wage hike of more than 60%.
D) Proper pay scales with proper increment rate.
E)  Proper promotion policy and proper allowances.
F) Wage revision from 1/1/2014.
  • DA as likely on 1st Jan 2016 is likely at 125%.
  • After 7th CPC implementation it will DA will be zero %
  • Existing Basic Minimum wage is Rs 7000/- as on 1/1/06
  • Add 125% DA as on 1/1/2016 =Rs 8750/-
  • Total existing Minimum Wage as on 1/1/2016 is Rs 15750/-
  • If the Minimum wage is fixed at Rs 25,000/-
  • Net Increase shall be Rs 9250/-
  • Net Increase should be 60%.
Comradely yours
(P.S.Prasad)
General Secretary
Source: govemployee

7th Pay Commission & Employee News Center: Seventh Pay Commission To Propose Higher HRA

7th Pay Commission & Employee News Center: Seventh Pay Commission To Propose Higher HRA: New Delhi: The Seventh Pay Commission is likely to propose to increase House Rent Allowance (HRA) of central government employees, besides t...

Sunday, September 13, 2015

NOW, CENTRAL GOVT STAFF SEEK OROP IN 07TH PAY COMMISSION

NEW DELHI, SEPT 12: The joint consultative machinery for all Central Government staff has demanded that one rank one pension be implemented for all current and future pensioners. The demand is to implement it in the Seventh Pay Commission.
The move comes shortly after the Government decided to implement OROP for defence personnel.
OROP already exists for the judges of the Supreme Court, High Court and CAG, the letter stated, written by Shiva Gopal Mishra, Secretary, joint consultative machinery, Central Government Employees.
The letter has been written to the Seventh Pay Commission Chairman Justice Ashok Kumar Mathur.
Source:- The Hindu Business Line 

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