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Friday, September 18, 2015

OROP: सरकारी कर्मियों से 20 साल कम जीते हैं सैनिक, जानें कौन सी जॉब में ज्‍यादा life

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अन्‍य दूसरी नौकरियों की बजाए सेना की जॉब करने वाले कम जिंदगी जीते हैं। जी हां, जब तक अन्‍य सरकारी कर्मचारी 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं पूर्व सैनिक औसतन 64 साल की उम्र में जिंदगी को अलविदा कह देते हैं। यह हम नहीं पांचवें वेतन आयोग के एक सर्वे में खुलासा हुआ था। यही वजह है कि अपने हक के लिए पूर्व सैनिक वन रैंक वन पेंशन लागू करवाने के लिए पिछले 40 साल से भी ज्‍यादा समय से संघर्ष कर रहे हैं। आइए एक खुलासे में जानते हैं कौन सी जॉब करने वाले जीते हैं भरपूर लाइफ...
जल्‍दी रिटायरमेंट, जल्‍दी मौत
सेना में जॉब करने वाले सैनिक जल्‍दी रिटायर कर दिए जाते हैं और वे जल्‍दी मर भी जाते हैं। पांचवे वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों पर एक सर्वे किया था जिसमें यह बात सामने आई। पांचवें वेतन आयोग के लिए यह सर्वेक्षण एक सरकारी एजेंसी ने किया था. सर्वे कहता है कि :

जॉबऔसत उम्र
1- सिविलियन सर्विसेज77 वर्ष
2- रेलवे कर्मचारी78 वर्ष
3- सैन्‍य कर्मचारी
i- OR (हवलदार तक)59.6 से 64 साल
ii- JCOs67 साल
iii- Officers72.5 साल


सैनिकों की जिंदगी सरकारी कर्मचारियों से 20 साल कम
सर्वे में कहा गया है कि सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके कर्मचारियों के मुकाबले सेना में नौकरी कर चुके जवान औसतन 20 साल पहले ही मर जाते हैं। जेसीओ की उम्र जवानों के मुकाबले औसतन 5 साल ज्‍यादा होती है लेकिन वे सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके कर्मचारियों के मुकाबले औसतन 15 साल कम ही जीते हैं। सैन्‍य अधिकारी इस मामले में थोड़ा लकी हैं लेकिन वे भी सामान्‍य सरकारी सेवाओं में काम कर चुके अपने समकक्ष कर्मचारियों के मुकाबले औसतन 7 साल कम जिंदगी ही जी पाते हैं।

कठिन लाइफ में पनपती चिंता बन जाती है चिता
पूर्व सैनिकों का मानना है कि सैन्‍य जीवन बहुत कठिन होता है। कठिन तैनाती और हर समय आंखों के सामने नाचती मौत से सैनिक हमेशा स्‍ट्रेस में रहते हैं। उन पर अपना मोराल ऊंचा रखने का दबाव रहता है। जॉब के दौरान वे तलवार की धार पर चलते हैं इधर गल्‍ती उधर मौत और देश की सुरक्षा खतरे में। इतने तनाव के बाद जब परिवार-बच्‍चों की जिम्‍मेदारी सर पर आती है दूसरे शब्‍दों में कहें तो जब उनकी जिम्‍मेदारी चरम पर होती है तो वे रिटायर कर दिए जाते हैं। उस तुर्रा ये कि पेंशन भी कम. जबकि उनकी इस उम्र में सरकारी कर्मचारी नौकरी पर होते हैं और पूरा वेतन पा रहे होते हैं। बच्‍चों की पढ़ाई, नौकरी, शादी वगैरह की चिंता में वे समय से पहले बूढ़े हो जाते हैं और मर जाते हैं।


7वें वेतन आयोग से गुहार, 1973 से पहले वाली स्थिति लागू हो
कुछ माह पहले मेजर जनरल सतबीर सिंह की अगुआई में पूर्व सैनिकों के एक प्रतिनिधि मंडल ने 7वें वेतन आयोग से मिलकर उन्‍हें अपनी सेवा शर्तों और जिम्‍मेदारियों सहित सभी कठिनाइयों से अवगत कराया है। उन्‍होंने 7वें वेतन आयोग से अनुरोध किया है कि पूर्व सैनिकों की पेंशन के लिए वही फार्मूला लागू किया जाए जो 1973 से पहले लागू था। उनका यह भी कहना था कि आयोग को सैनिकों के काम करने वाले चुनौतीपूर्ण माहौल और उनकी जिम्‍मेदारियों को ध्‍यान में रखकर फैसला लेना चाहिए जो पूर्व सैनिकों के हित में हो।

इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने डाला पूर्व सैनिकों को संकट में
आपको बताते चलें कि सैनिकों की कठिन सेवा शर्तों और जोखिम भरी लाइफ स्‍टाइल को देखते हुए 1973 से पहले उन्‍हें वन रैंक वन पेंशन तो दिया ही जाता था साथ ही सामान्‍य सरकारी सेवाओं के मुकाबले 15 प्रतिशत तक ज्‍यादा पेंशन भी दी जाती थी। 1973 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस सरकार ने यह व्‍यवस्‍था खत्‍म कर दी थी। उसके बाद पूर्व सैनिकों को भी अन्‍य सरकारी कर्मचारियों जितनी पेंशन मिलने लगी और उनके दुर्दिन शुरू हो गए। तभी से पूर्व सैनिक वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

कहां कितनी मिलती है पूर्व सैनिकों को पेंशन
देशज्‍यादा (अन्‍य सरकार नौकरियों के मुकाबले)
अमेरिका20 प्रतिशत तक
ब्रिटेन10 प्रतिशत
फ्रांस15 प्रतिशत
पाकिस्‍तान15 प्रतिशत तक
जापान29 प्रतिशत तक
भारत0 प्रतशित यानी बराबर
Source: IESM (पूर्व सैनिकों का संगठन)

एक रैंक एक पेंशन का रक्षा क्षेत्र पर असर

क रैंक, एक पेंशन लागू होने के बाद रक्षा खर्च में बढ़ोतरी होने का अर्थ यह है कि सेना के आधुनिकीकरण के काम में पूंजी की और अधिक आवश्यकता होगी। विस्तार से बता रहे हैं नितिन पई
अब जबकि मोदी सरकार ने एक रैंक एक पेंशन (ओआरओपी) को लागू करने का फैसला कर लिया है तो यह आवश्यक हो चला है कि हम रक्षा नीति और तैयारी के लिहाज से इसके निहितार्थ का आकलन करते चलें। इसकी वजह से न केवल केंद्र सरकार के व्यय में दो फीसदी की अनुमानित बढ़ोतरी होगी बल्कि यह सर्वोच्च रक्षा नेतृत्व से लेकर संभावित सैनिक, और विदेशी हथियार आपूर्तिकर्ता से लेकर घरेलू रक्षा नवाचार करने वाले तक सबके लिए प्रोत्साहन में तब्दीली आ जाएगी। हम इस स्तंभ में आने वाले काफी समय तक इन विषयों का विश्लेषण करते रहेंगे। 

इस आलेख में हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि ओआरओपी का देश के सैन्य बलों के भविष्य की रूपरेखा पर क्या संभावित असर हो सकता है। इसकी बदौलत रक्षा खर्च में 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा लागू होने के बाद वेतनमान में होने वाला सुधार इसमें और अधिक इजाफा कर देगा। इससे रक्षा नीति के समक्ष तीन मोर्चों पर असुविधा पैदा होगी: वेतन भत्ते, रक्षा क्षेत्र की तैयारी का स्तर और राजकोषीय संतुलन। हम एक साथ इन तीनों में अत्यधिक इजाफा नहीं कर सकते। ओआरओपी के कारण आर्थिक बोझ बहुत तेजी से बढ़ेगा और अगर इसके चलते रक्षा तैयारी में समझौता नहीं किया गया तो राजकोषीय संतुलन के मोर्चे पर हमें परेशानी उठानी पड़ेगी। इसके लिए हमें कर्ज लेना होगा।

हम इस तीन स्तरीय दुविधा से पलायन नहीं कर सकते। हां, हम इसके प्रभाव को कम जरूर कर सकते हैं: इसका सबसे बढिय़ा तरीका है तेज आर्थिक वृद्धि। अगर हम सतत रूप से तेज आर्थिक विकास कर सकें तो हमें ओआरओपी के कारण बढ़े हुए राजकोषीय बोझ का प्रभाव कम करने में मदद मिलेगी। सेवानिवृत्त सैनिकों और उनके समर्थकों की ओर से अगर सुधार और आर्थिक उदारीकरण की मांग आती है तो भविष्य के वित्त मंत्रियों की ओआरओपी को सीमित करने की चिंता कम हो जाएगी।

ओआरओपी के आगमन से पहले भी दो दशकों तक तेज आर्थिक विकास के चलते अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में श्रम अपेक्षाकृत महंगा हो चुका है। जैसा कि अजय शुक्ला ने कुछ दिन पहले लिखा था कि ओआरओपी के बाद रक्षा खर्च का 53 फीसदी हिस्सा कार्मिकों पर खर्च होगा। सन 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने के तत्काल बाद आइजनहावर को बढ़ते रक्षा खर्च की मुश्किल का सामना करना पड़ा था। यह शीतयुद्ध के चलते पैदा हुआ था और इसके नियंत्रण से बाहर होने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा था। उस वक्त उन्होंने जो कदम उठाया वह भविष्य के नेताओं के लिए नजीर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वैसा कुछ करने पर विचार कर सकते हैं।

आइजनहावर की नीति में अतिरिक्त श्रम शक्ति के खर्च में सामरिक हथियारों में निवेश पर अनिवार्य जोर दिया गया। यूरोप और एशिया में भारी भरकम सेना बिठाने के बजाय अमेरिका परमाणु हथियारों, खुफिया ऑपरेशनों और अपने सहयोगियों पर भरोसा करने लगा। व्यापक विरोध के भय ने तत्कालीन सोवियत संघ को आगे बढऩे से रोके रखा। दूसरे शब्दों में कहें तो आइजनहावर प्रशासन ने श्रम का विकल्प पूंजी से तैयार किया। अर्थात उसने सैनिकों के बजाय परमाणु हथियारों और आपूर्ति व्यवस्था पर जोर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें लगा कि श्रम शक्ति की लागत देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुुंचा रही है। आजइनहावर को भरोसा था कि अमेरिकी आर्थिक विकास की मजबूती सोवियत संघ के साथ संघर्ष में काफी अहम थी। क्या भारत भी वही रास्ता अपना सकता है? क्या हम भी अधिकांश सैनिकों की जगह परमाणु हथियारों, मिसाइलों, विमानों, पनडुब्बियों आदि पर भरोसा कर सकते हैं? 

आइजनहावर की तरह हमें भी समझना होगा विरोधी कभी इस बात पर यकीन नहीं करेंगे कि हम केवल उनके सीमा पार करने अथवा आतंकी घुसपैठ करने की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे में एक पूरे देश को नष्ट कर सकने वाले हथियार होने के बावजूद हमें सीमाओं की रक्षा करने के लिए जवानों की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह हमें समुद्री सीमा पर भी नौसैनिकों की जरूरत होगी।

दुश्मन के सामने रहने वाली इन सैन्य टुकडिय़ों को कम बोझ वाला, सहज और नेटवर्क से लैस बनाना होगा। उनको हथियारों, मिसाइल और हवाई सहयोग के साथ-साथ लॉजिस्टिक और बुनियादी मदद भी मुहैया करानी होगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सैन्य संतुलन हमारे पक्ष में है। सवाल यह भी उठता है कि अगर 20वीं सदी में हुए युद्घों की तरह बड़े पैमाने पर होने वाले युद्घों के दिन बीत चुके हैं तो फिर सामरिक हथियारबंदी और मोर्चे पर रहने वाली सेना की जरूरत किस आधार पर तय होगी? 

अगर प्रधानमंत्री को हमारी रक्षा नीति पर नए सिरे से नजर डालनी हो तो इसमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि यदि देश की अर्थव्यवस्था में विकास के बीच सैनिकों के रखरखाव की बढ़ती लागत के कारण उनकी संख्या कम करनी हो तो सेना के आधुनिकीकरण की राह पूंजी आधारित होनी चाहिए। कार्मिक नीति कुछ ऐसी होनी चाहिए कि सैनिकों की उत्पादकता बढ़ाने में लगातार निवेश हो। इसके लिए उनको बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए, बेहतर उपकरण मुहैया कराए जाएं तथा उनकी स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। ये तमाम फैसले अभी करने होंगे क्योंकि उनके प्रभाव को सामने आने में भी वक्त लगेगा। 

आइजनहावर को अवसर की लागत की समझ थी। उन्होंने संघीय व्यय का आधा हिस्सा रक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित किया लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि हर बनने वाली बंदूक, हर युद्घपोत, हर दागा गया रॉकेट दरअसल उन लोगों के हिस्से के धन का है जो भूखे हैं और जिनको भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा, जो ठंड में ठिठुर रहे हैं और जिनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं। यह खर्च उचित था क्योंकि सशस्त्र बलों ने न केवल एक इलाके और उसके लोगों की रक्षा की बल्कि उन्होंने एक जीवनशैली को भी बचाया। बतौर राष्टï्रपति उनका काम था सेना प्रमुखों को यह अहसास कराना कि उनका कद और समझदारी ऐसी है और उनको ऐसा प्रशिक्षण मिला है कि वे युद्घ की महंगी कार्रवाई में न्यूनतम की जरूरत और देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति के बीच संतुलन कायम कर सकें। आज के भारत के संदर्भ में भी आइजनहावर की बातें उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि वे छह दशक पहले अमेरिका के बारे में थीं।
SOURCE - business-standard

Black money law helps OROP soldier on

Black money law helps OROP soldier on
Those who have retired after a lifetime of defending the nation will get their dues without hurting the exchequer perhaps because those who hid their unaccounted wealth from the taxman have paid theirs.
Business Standard has learnt from senior government sources that the three month-compliance window under the black money law could garner around Rs 20,000 crore, an amount without which implementation of one rank, one pension (OROP) would have led to stretching of the Centre's fiscal resources. With such proceeds expected through an imposition of 30 per cent tax, and a similar penalty on the value of unaccounted wealth or assets declared by anyone between July and September, the government may be able to stick to the fiscal deficit target of 3.9 per cent of the gross domestic product (GDP), without cutting capital expenditure required to kickstart investments.

EMPLOYEE NEWS CENTER: Government to announce family pension to employees...

EMPLOYEE NEWS CENTER: Government to announce family pension to employees...: Family Pension for NPS Employees – A report states that between April 1994 and April 2004, more than 50 lakh youths joined Government Serv...

Wednesday, September 16, 2015

7th Central Pay Commission – Regularisation of Retirement Age?

As the recommendation and implementation of the 7th Central Pay Commission is eagerly awaited by the central government employees, some points in the recommendations are slightly leaking in..It may not be authentically correct.
According to information from various sources, the Pay Commission may fix the minimum basic pay at Rs. 15000/- and it is assumed that a huge increase in the salaries of the employees cannot be expected. The term of the commission was extended for four months and they are in full swing giving final touches to the report to be submitted to the central government by the end of December 2015.
One more recommendation which is said to be an important one, is the regularisation of retirement age for the Central Government Employees. The Commission may recommend that an employee should retire after completing 33 years of service or at the age of 60 whichever comes first. For instance, if an employee joins a central government establishment at the age of 23, his retirement age will be 56. If this recommendation is true, it will definitely create panic among  the employees and it will not be a wise decision by the pay commission. All Federations and Associations will strongly oppose these type of recommendations…
The 6th CPC had brought various changes in the Pay Structures and introduced Grade Pay. There was a moderate increase in the Basic Pay, House Rent Allowance and re-imbursement of tuition fees was also introduced. The minimum basic pay was Rs.5200+Grade Pay 1800=Rs. 7000/- while it was Rs. 2650/- in the 5th CPC.
Further, it is also said that, the 7th CPC may abolish the 6th CPC’s Pay Scales and may bring back the old pay scales. The overall increase in the Pay Scale will be around 15% to 20%
Let us wait and see for the ultimate results…!
SOURCE - govtstaffnewsport al.in